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Saturday, 15 July 2017

प्रधानमंत्री बनने की ख्‍वाहिशों को फिलहाल तिलांजलि देने के इच्‍छुक हैं नीतीश कुमार - nitish kumars busting his chances of running for pm and is ok with it




बिहार की सियासत में जारी मौजूदा गतिरोध के बीच यह बात पाक-साफ सी दिखती है कि 66 साल की उम्र में नीतीश कुमार अपनी ईमेज को नए सिरे से गढ़ना चाहते हैं और इसके लिए वह प्रधानमंत्री बनने की ख्‍वाहिशों को फिलहाल तिलांजलि देने के इच्‍छुक भी दिखते हैं. दरअसल उनका यह पीएम पद की रेस में बने रहने का मंसूबा तभी पूरा हो सकता है जब वह बीजेपी के खिलाफ विपक्ष के एक बड़े नेता के रूप में बने रहें. लेकिन हालिया परिदृश्‍य को देखकर ऐसा लगता है कि नीतीश ने यह निश्‍चय कर लिया है कि फिलहाल इसकी कोई उपयोगिता नहीं है. इसकी एक सबसे बड़ी बड़ी वजह यह है कि दरअसल उन्‍होंने दो बीजेपी विरोधी पार्टियों राजद और कांग्रेस के साथ गठबंधन की सरकार चलाने से उपजी निराशा से यह समझ लिया है. संभवतया इसीलिए उन्‍होंने तेजस्‍वी यादव (28) को खुद को बेदाग साबित करने का अल्‍टीमेटम दिया है.


दरअसल राजनीतिक जानकारों के मुताबिक इसके पीछे की सबसे बड़ी वजह यह है कि नीतीश कुमार का यह मानना है कि कांग्रेस बीजेपी के खिलाफ विपक्ष की धुरी बनने में नाकाम रही है और लालू परिवार के ऊपर लगे भ्रष्‍टाचार के मामलों के कारण राजद के साथ गठजोड़ उनकी छवि के लिए खतरा है.

दरअसल पिछले साल असम चुनावों के दौरान सबसे पहले उन्‍होंने नीतीश कुमार ने कांग्रेस से विपक्षी दलों का एक गठबंधन बनाने की बात कही थी लेकिन कांग्रेस ने उनकी मांग नजरअंदाज कर दी. नतीजतन 15 सालों से असम की सत्‍ता पर काबिज कांग्रेस हारकर बाहर हो गई. उन्‍होंने उसके बाद उत्‍तर प्रदेश में बिहार की तर्ज पर महागठबंधन की वकालत की थी लेकिन उसका भी कोई असर नहीं हुआ. उसके बाद यूपी के चुनाव परिणामों में बीजेपी की प्रचंड जीत के बाद नीतीश को यह लगने लगा कि बीजेपी के विजय रथ को रोकने का साहस अब कांग्रेस के पास फिलहाल नहीं है.

राष्‍ट्रपति चुनावों में भी नीतीश कुमार ने विपक्षी एकता की वकालत करते हुए पहल की लेकिन इन सबके बीच बीजेपी ने नामनाथ कोविंद की उम्‍मीदवारी का पहले ही ऐलान कर दिया. बिहार के राज्‍यपाल होने के नाते नीतीश ने उनका समर्थन करते हुए कह दिया कि बिना 'वैकल्पिक विमर्श' के केवल विपक्षी जमावड़ा का कोई मतलब नहीं है.

ऐसे में बड़ी बात यह है कि यदि नीतीश कुमार महागठबंधन से अलग हो जाते हैं और बीजेपी के साथ साझेदारी कर लेते हैं तो एक तरफ से वह विपक्ष की तरफ से प्रधानमंत्री पद की उम्‍मीदवारी की रेस से हट जाएंगे. दूसरा भ्रष्‍टाचार के मामले में यदि नीतीश, तेजस्‍वी को हटा देते हैं तो उनकी सुशासन बाबू की इमेज को लाभ मिलेगा. इससे बीजेपी को यह फायदा होगा कि उनके खेमे में फिर से एक कद्दावर चेहरा होगा लेकिन साथ में यह भी चिंता होगी कि अबकी बार नीतीश कुमार का कद पहले की तुलना में थोड़ा ऊंचा होगा.

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