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Tuesday, 8 August 2017

11-12 अगस्त की रात को आसमान में खूब रोशन दिखाई देगी - perseid meteor shower on 12 august after chandra grahan



नई दिल्लीः क्या आप जानते है कि 11-12 अगस्त की रात अंधेरा नहीं होगा. जी हां इस रात को आसमान में खूब रोशन दिखाई देगी. हर कोई इस खबर को लेकर हैरत में है. कुछ लोग सोच रहे हैं कि ऐसा कैसे हो सकता है? वहीं कुछ लोग इसे कुदरत का करिशमा मान रहे हैं. इन सबके बीच कुछ ऐसे भी लोग हैं तो वैज्ञानिक तथ्यों को आधार मानते हुए इसे एक खगोलीय घटना मात्र समझ रहे है. वर्तमान युग में विज्ञान चाहे कितनी भी प्रगति कर ली हो, लेकिन ब्रह्मांड में अभी भी बहुत सारी गुत्थी ऐसी है जो अनसुलझी है. मतलब आज भी आकाश में होने वाली घटनाएं वैज्ञानिक समुदाय के लिए रहस्य बनी हुई हैं.


ऐसा ही कुछ 11-12 अगस्त की आधी रात होने जा रहा है. खगोलविदों (एस्ट्रोनॉट्स) के मुताबिक उस रात आसमान से धरती पर उल्का पिंडों की बारिश होने वाली है. खगोलविदों को मानना है कि ऐसी घटना हरेक साल जुलाई से अगस्त के बीच होती है लेकिन इस बार उल्का पिंड ज्यादा मात्रा में गिरेंगे, इसलिए कहा जा रहा है कि 11-12 अगस्त की रात आसमान में अंधेरा नहीं बल्कि उजाला होगा.



ऐस्ट्रोनोमी-फिजिक्स डॉट कॉम की एक वायरल स्टोरी के मुताबिक, इस साल होने वाली उल्का पिंडों की बारिश इतिहास के उल्का पिंडों की बारिश से सबसे ज्यादा चमकीली और रोशनी वाली होगी. अमेरिकी अंतरिक्ष एजेंसी नासा ने भी इसकी पुष्टि की है. नासा की रिपोर्ट के मुताबिक, इस साल गिरने वाले उल्का पिंड की मात्रा पहले के मुकाबले ज्यादा होगी. नासा के मुताबिक इस साल 11-12 अगस्त की मध्यरात्रि में प्रति घंटे 200 उल्का पिंड गिर सकते हैं. नासा के मुताबिक उत्तरी गोलार्द्ध में इसे अच्छे तरीके से देखा जा सकता है.



गौरतलब है कि खगोल विज्ञान में आकाश में कभी-कभी एक ओर से दूसरी ओर तेजी से पृथ्वी पर गिरते हुए जो पिंड दिखाई देते हैं उन्हें उल्का (meteor) कहते हैं. साधारण बोलचाल की भाषा में इसे ‘टूटते हुए तारे’ अथवा ‘लूका’ कहते हैं. उल्काओं का जो अंश वायुमंडल में जलने से बचकर पृथ्वी तक पहुंचता है उसे उल्कापिंड (meteorite) कहते हैं. अक्सर हरेक रात में अनगिनत संख्या में उल्काएं आसमान में देखी जा सकती हैं लेकिन इनमें से पृथ्वी पर गिरनेवाले पिंडों की संख्या कम होती है.
खगोलीय और वैज्ञानिक दृष्टिकोण से इनका महत्व बहुत अधिक है क्योंकि एक तो ये अति दुर्लभ होते हैं, दूसरे आकाश में विचरते हुए विभिन्न ग्रहों इत्यादि के संगठन और संरचना (स्ट्रक्चर) के ज्ञान के प्रत्यक्ष स्रोत होते हैं. इनकी स्टडी से हमें यह पता चलता है कि भूमंडलीय वातावरण में आकाश से आए हुए पदार्थ पर क्या-क्या प्रतिक्रियाएं होती हैं. इस प्रकार ये पिंड खगोल विज्ञान और  भू-विज्ञान के बीच संबंध स्थापित करते हैं.


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