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Friday, 30 March 2018

बिहार में नीतीश के पास विकल्प हीं नही हैं - nitish kumar has no other options in bihar



पटना: बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के पास क्या विकल्प हैं? यह सवाल बीते 10 दिनों से बार-बार उठ रहा है. केंद्रीय मंत्री और बिहार से बीजेपी सांसद अश्विनी चौबे के बेटे अरिजीत शास्वत नीतीश कुमार को खुलेआम चुनौती दे रहे हैं. बिहार के सीएम ने कभी सोचा भी नहीं होगा कि उनके धुर विरोधी बन चुके तेजस्वी यादव की तरह ही एनडीए की अंदर ही कोई चुनौती बन जाएगा. भागलपुर में दंगा भड़काने के मामले में अरिजीत के खिलाफ कोर्ट ने वारंट किया है. अरिजीत शास्वत का कहना है कि उन्हें आत्मसमर्पण क्यों करना चाहिए? कोर्ट वारंट जारी करता है लेकिन अदालत आश्रय भी देती है. एक बार जब आप अदालत में जाते हैं तो आप केवल वही करेंगे जो वह आपके लिए तय किया गया होता है. 


उधर अश्विनी चौबे भी अपने बेटे के बचाव में आ गए हैं. उसने कोई गलत काम नहीं किया. उन्होंने कहा, 'सही कहा है कि उसने. जो भगोड़ा होता है वो भागता है, उसने कोई गलत काम नहीं किया है. भारत माता की जयकार और वंदे मातरम किया है उसने, जय श्रीराम कहा है. क्या इस देश के अंदर ये अपराध है, अगर ये अपराध तो वो अपराधी हो सकता है.' उन्‍होंने कहा कि एफआईआर कुछ नहीं है. वह एक कूड़ा है जो कुछ भ्रष्‍ट अफसरों ने दर्ज की है. मेरे बेटे ने कोई गलती नहीं की है.


दूसरी ओर एक और केंद्रीय मंत्री गिरिराज सिंह ने भी मोर्चा खोल रखा है. बीजेपी नेताओं के बयान से आरजेडी नेता तेजस्वी यादव भी नीतीश कुमार पर निशाना साधने से नहीं चूक रहे हैं. दरअसल बिहार में हाल ही में हुए उपचुनाव के बाद से यहां पर सांप्रदायिक संघर्ष बढ़ गया है. रामनवमी के दौरान भागलपुर में तो झड़प की भी खबरें आने लगीं. इसके बाद बिहार के कई जिलों में तनाव बढ़ता चला गया.


बिहार के सीएम नीतीश कुमार की भी झुंझलाहट साफ देखी जा सकती है. पहली बार मुख्यमंत्री नीतीश कुमार, विपक्ष के नेता तेजस्वी यादव द्वारा उठाए गए सवालों पर अपना आप खोते दिखे. उन्होंने तेजस्वी से यह तक कह डाला कि ‘सुनो बाबू, अभी राजनीति में लंबा करियर है. नीतीश कुमार ने 2013 में ही सांप्रदायिकता और धर्मनिरपेक्षता के सवाल पर एनडीए से नाता तोड़ा था. लेकिन बीजेपी से हाथ मिलाने के बाद अभी जो हालात बने हैं और उस पर बीजेपी नेताओं के बयान उनकी सुशासन और धर्मनिरपेक्ष छवि पर गहरी चोट पहुंचा रही है. हालांकि जेडीयू की ओर से बीजेपी को एक कड़ा संदेश देने की भी कोशिश की गई है. बिहार में कानून व्यवस्था को लेकर उठे सवाल पर जेडीयू के महासचिव श्याम रजक ने कहा कि नीतीश जी कानून-व्यवस्था के मुद्दे पर कोई समझौता नहीं करते और इसके लिए हम कोई भी कीमत देने के लिए तैयार हैं. ​


नीतीश कुमार ऐसे ही नहीं परेशान हैं. दरअसल उनके पास विकल्प भी बहुत नही हैं. बिहार में लालू प्रसाद यादव के साथ मिलकर 17 महीने तक सरकार चलाने वाले नीतीश कुमार ने आरजेडी सुप्रीम के परिवार पर लग रहे भ्रष्टाचार के आरोपों के चलते गठबंधन तोड़ लिया था. इसके साथ ही उन्होंने राज्य में उन्होंने माय (MY) समीकरण यानी मुस्लिम-यादव से भी नाता तोड़ा था. उस समय उन्होंने कहा था कि इस गठबंधन में उन्हें 'घुटन' होने लगी थी.


अब उनका लालू के साथ दोबारा जाने का कोई सवाल तो हाल-फिलहाल नहीं उठता है. लेकिन शांत होकर 'घुटते' रहना नीतीश का स्वभाव नहीं है. तो क्या वह इसलिए चुप हैं क्योंकि वह अंदर ही अंदर कोई विकल्प तलाश रहे हैं. 14 अप्रैल यानी बाबा साहब भीमराव अंबेडकर की जयंती के दिन नीतीश कुमार और लोकजनशक्ति पार्टी के नेता रामविलास पासवान एक कार्यक्रम में हिस्सा लेने जा रहे हैं.  ऐसे ही एनडीए की ओर सहयोगी पार्टी राष्ट्रीय लोकसमता पार्टी नेता उपेंद्र कुशवाहा भी खुलकर 'विभाजनकारी राजनीति' के खिलाफ नीतीश कुमार का समर्थन कर चुके हैं.


अगर इस समीकरण को वोट बैंक के लिहाज से देखें तो गैर-यादव ओबीसी और महादलित के बीच यह समीकरण बनता है जो कि बिहार में कुल 38 प्रतिशत के आसपास हैं. नीतीश कुमार को राज्य में कुर्मी और कोरी जातियों के प्रतिनिधि के तौर पर देखा जाता है. लेकिन कुशवाहा ने कोरी वोटबैंक में सेंध लगा दी थी. लेकिन अगर कुशवाहा साथ आते हैं तो नीतीश कुमार मजबूत होंगे.


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